ओ सुहसनी, ओ विधुवदनीतेरी आभा है अक्षय प्रियदेख,हो रहा चंदरमा उदयस्वचछ गगन पर पुन: उदयहोगा कितनी बार आज केबाद यह उदय इसी प्रकारऔर इसी झूर-मुट मे मुझकोखोज-खोज जाएगा हार
Lajvab...!!
Lajvab...!!
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