Sunday, December 28, 2008

"उमर ख़ैयाम"

ओ सुहसनी, ओ विधुवदनी
तेरी आभा है अक्षय
प्रियदेख,हो रहा चंदरमा उदय
स्वचछ गगन पर पुन: उदय
होगा कितनी बार आज के
बाद यह उदय इसी प्रकार
और इसी झूर-मुट मे मुझको
खोज-खोज जाएगा हार

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